देखते रहना किसी पर्वत के उतंग शिखर से किंकर्तव्यविमूढ़। देखते रहना किसी पर्वत के उतंग शिखर से किंकर्तव्यविमूढ़।
शत शत प्रणाम हे पूज्य संत , दोषों को मेरे क्षमा करना शत शत प्रणाम हे पूज्य संत , दोषों को मेरे क्षमा करना
लोग चले जाते हैं रह जाते हैं पन्ने... लोग चले जाते हैं रह जाते हैं पन्ने...
जो गड्ढे तुमनें खोदे हैं अपनी अमानत रखने को, जो गड्ढे तुमनें खोदे हैं अपनी अमानत रखने को,
तेरी हंसी में हंसू तुझे अपने में समेटे हुए बहती जाऊं। तेरी हंसी में हंसू तुझे अपने में समेटे हुए बहती जाऊं।
खफा था तुझसे मैं हर एक बात के लिए मगर ये लफ़्ज़ ना दे सके गवाही। खफा था तुझसे मैं हर एक बात के लिए मगर ये लफ़्ज़ ना दे सके गवाही।